सास और दामाद की चुदाई की कहानी

रिश्तों में चुदाई की कहानी अब आयेज-

अरुण (धीमी आवाज़ में): मौसी… आपने तो मुझे जन्नत दिखा दी. मुझे यकीन नही हो रहा की मैने अपनी मौसी को छोड़ा है. आप सच में बहुत मस्त हो.

मैं (उसके सीने पर हाथ फेरते हुए, हल्की उदासी दिखाते हुए): तुम भी, अरुण तुम भी. तुमने तो मुझे वो खुशी दी जो तुम्हारे मौसा जी ने कभी नही दी. पर बेटा हमारा ये राज़ किसी को नही बताना.

मैने उसकी आँखों में देखा, अपनी आवाज़ में थोड़ी सी भावुकता लाते हुए.

मैं: ये रात का राज़ हम दोनो के बीच ही रहना चाहिए. किसी को भी.. बिल्कुल किसी को भी पता नही चलना चाहिए. नही तो… (एक लंबी साँस ली) बहुत बदनामी हो जाएगी. मेरी भी और तेरी भी. तुम वादा करते हो ना, अरुण?

अरुण ने मेरा हाथ पकड़ कर ज़ोर से दबाया, उसकी आँखों में यकीन था.

अरुण (सिर हिलाते हुए, धीमी आवाज़ में): हा मौसी, मैं वादा करता हू. ये राज़ हमारे बीच ही रहेगा. आप चिंता मत करो.

उसने धीरे से अपने होंठ मेरे होंठो पर रखे. मैने भी उसको एक गहरा, आखरी किस किया. उसकी गर्मी और चाहत को महसूस करते हुए, मैने धीरे से उसे अलग हुई.

मैं (होंठो पर एक हल्की मुस्कान लिए): अब सो जेया बेटा.

मैं धीरे से बेड से उठी, अपने कपड़े पहने और बाल ठीक किए. फिर बिना कोई आवाज़ किए कमरे से बाहर निकल गयी. अंधेरा अभी भी च्चाया हुआ था और पूरा घर शांत था.

कुछ देर बाद, जब मैं ड्रॉयिंग रूम से गुज़र रही थी, तो मैने देखा की किंजल भाभी भी धीरे से च्चत वाले कमरे की तरफ से नीचे आ रही थी. उनके चेहरे पर भी रात की मस्ती और थकान सॉफ दिख रही थी, और उनकी चाल में एक अजीब सी धीमी सी मुस्कान थी.

हम दोनो की नज़रें मिली. एक पल के लिए हम दोनो शरमाये. फिर एक हल्की सी मुस्कान हमारे होंठो पर आ गयी. मैने उन्हें अपने पास बुलाया.

मैं (धीमी, सिसकारी भारी आवाज़ में): क्या हुआ, भाभी? रात कैसी रही? दामाद जी ने पूरी नींद तोड़ दी लगता है?

किंजल भाभी मेरे करीब आई और धीमे से मेरी कमर पर हाथ रख दिया. उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जो बता रही थी की वो कितनी उत्सुक थी अपनी रात की दास्तान सुनने के लिए.

किंजल भाभी (शरमाते हुए, पर एक हॉर्नी मुस्कान के साथ): दीदी बस पूछो मत. उन्होने तो जन्नत दिखा दी. दामाद जी तो सच में बेहद कमाल है. उनका लंड अयाया!

मैं (उनके कान में फुसफुसते हुए, हल्के से हंसते हुए): अछा जी? बताओ क्या-क्या किया उन्होने? पूरी डीटेल में बताओ, मेरी जान. मेरी छूट भी गरम हो रही है तुम्हारी बातें सुन कर.

किंजल भाभी और शर्मा गयी, पर उन्होने अपनी आँखें बंद कर ली और एक लंबी साँस ली.

किंजल भाभी: दीदी, जैसे ही मैं च्चत पर पहुँची, वो तो पहले से ही नंगे थे. उनका मोटा लंड खड़ा था, जैसे मेरा ही इंतेज़ार कर रहा हो. मैने तो जाते ही उनका लंड मूह में ले लिया और वो क्या बतौ, दीदी, इतना मीठा. मैने उसे लॉलिपोप की तरह चूसा, पूरा गले तक उतार दिया. वो भी सिसकारियाँ भरने लगे.

मैं (मेरी साँसें भी तेज़ हो रही थी): आ फिर? फिर क्या हुआ?

किंजल भाभी: फिर उन्होने मुझे पकड़ा और ज़मीन पर पटक दिया. मेरी मॅक्सी निकाल दी और मेरी ब्रा-पनटी भी उतार दी. दीदी, मैं पूरी नंगी थी. उन्होने मेरी छूट को चाटना शुरू किया अयाया, दीदी.. उनकी जीभ… वो तो मेरी छूट के दाने पर ऐसा खेल रहे थे की मैं दो मिनिट में झाड़ गयी. मेरा सारा रस्स पी गये, दीदी.

किंजल भाभी का बदन काँप रहा था जब वो ये सब बता रही थी. उनकी आँखों में वो सारा नशा सॉफ दिख रहा था.

मैं (मेरे जिस्म में भी आग लग रही थी): और फिर? चुदाई कैसे हुई?

किंजल भाभी: उन्होने अपना मोटा लंड मेरी छूट पर रखा और एक ही धक्के में पूरा अंदर घुसा दिया. दीदी, इतना ज़ोर से किया की मेरी आँखों से पानी आ गया. पर फिर वो धीरे-धीरे करने लगे और इतना मज़ा आया, दीदी मैं तो बस मोन करती रही. उन्होने मुझे कभी घोड़ी बनाया, कभी मिशनरी पोज़िशन में छोड़ा.

हमने तो 2 रौंद किए, दीदी. उन्होने मुझे छोड़-छोड़ कर पागल कर दिया. आख़िर में, वो मेरी छूट में झाड़ गये, दीदी. उनका गरम पानी मेरी छूट में भर गया. ऐसा लगा जैसे पूरा बदन ठंडा हो गया.

किंजल भाभी ने अपनी आँखें खोली और मेरी तरफ देखा. उनके चेहरे पर एक अजीब सी शांति और संतुष्टि थी.

किंजल भाभी: दीदी, आपने जो मुझे ये रास्ता दिखाया है ना मैं आपकी हमेशा शुक्रा-गुज़ार रहूंगी.

मैने उन्हें गले लगा लिया. हम दोनो की साँसें अब तेज़ हो चुकी थी, और हम एक-दूसरे की गर्मी महसूस कर रहे थे. सुबह जब मेरी आँख खुली, तो देखा किंजल भाभी अभी भी गहरी नींद में थी. मैने नहाई और सारी पहन कर दीदी को नाश्ता बनाने में हेल्प करने लगी.

आज मैने डार्क ब्लू कलर की शिफ्फॉन सारी पहनी थी. ये सारी मेरे बदन पर ऐसे चिपक रही थी जैसे मेरी दूसरी स्किन हो, जो मेरे भरे हुए कुवर्व्स को और भी सॉफ दिखा रही थी. इसके साथ मैने मॅचिंग ब्लू कलर का डिज़ाइनर ब्लाउस पहना था, जिसके गले और बाहों पर हल्का काम था, जो मेरे बूब्स की क्लीवेज को और भी सेक्सी बना रहा था. सच में मैं आज कुछ ज़्यादा ही सेक्सी लग रही थी. मेरी पतली कमर और भारी गांद इस सारी में कमाल लग रही थी.

जब दामाद जी और अरुण आए, तो वो दोनो मुझे देखते ही रह गये. उनकी नज़रों में एक अलग चमक थी, जिसे मैं सॉफ पहचान सकती थी.

मैं किचन सॉफ करके बाहर आई. सभी लोग नाश्ता कर रहे थे और छाई की चुस्कियाँ ले रहे थे. मैं भी सब के साथ नाश्ते पर बैठ गयी. हम सब बातें कर ही रहे थे की दीदी के घर वाले फोन पर रिंग बाजी. दीदी ने फोन उठाया.

दीदी (फोन पर बात करते हुए): हा… ठीक है… संगीता है… हा… अभी बुलाती हू.

उन्होने मेरी तरफ देखा.

दीदी: संगीता, रमण जी का फोन है.

मेरी आँखों में हल्की हैरानी थी, इतनी सुबह-सुबह नाश्ते के बीच? मैने फोन लिया.

रमण जी (फोन पर): तुम घर कब तक आ रही हो? कुछ ज़रूरी काम है यहाँ.

उनकी आवाज़ में कुछ ऐसी बात थी की मैं माना नही कर पाई. मैने उन्हें बताया की मैं आज निकल रही हू. मैने सब को ये बात बताई तो तीनो का मूह उतार गया – दामाद जी, अरुण और किंजल भाभी. सब के चेहरे पर एक मायूसी सी च्छा गयी थी. जब मैं अपना बाग पॅक कर रही थी, तब किंजल भाभी मेरे पास आई.

किंजल भाभी (उदास आवाज़ में): दीदी, जाना ज़रूरी है? आपके बिना मज़ा नही आएगा.

मैं (उन्हें गले लगते हुए, धीमी मुस्कान के साथ): मेरी जान, सब सेट है. तुम बिंदास एंजाय करना. और अपना ध्यान रखना, किसी को पता ना चले.

सबसे मिल कर और सब को अलविदा कह कर, मैं बस स्टॉप की तरफ चल दी. मेरे मॅन में अरुण की यादें घूम रही थी. साथ में दामाद जी और किंजल भाभी के बीच बन रहे रिश्ते के बारे में सोच रही थी.

मैं बस स्टॉप पर खड़ी थी, और वहाँ काफ़ी भीड़ थी. कॉलेज का समय था, इसलिए बहुत सारे लड़के और लड़कियाँ भी वहाँ खड़े थे.

मैने महसूस किया की कुछ कॉलेज के लड़के और कुछ आदमी मुझे घूर रहे थे. उनकी नज़रें मेरे बदन पर ऐसे फिसल रही थी जैसे वो मुझे मॅन ही मॅन नंगा कर रहे हो. मेरी गहरे नीले शिफ्फॉन सारी मेरे कुवर्व्स को और भी उभार रही थी, और उनकी हवस भारी नज़रें मुझे चुभन देने के बजाए, एक अजीब सी गर्मी दे रही थी. मैं तोड़ा शर्मा रही थी, पर अंदर ही अंदर एक नशा सा चढ़ रहा था. मैने उनकी तरफ देखा नही, पर उनकी नज़रों का बोझ अपने पुर जिस्म पर महसूस कर रही थी.

थोड़ी देर में बस आई, और जैसा की एक्सपेक्टेड था, सब लोग एक-दूं से उसमें घुसने लगे. एक धक्कम-धक्का शुरू हो गया. मैं भी बड़ी मुश्किल से बस में घुस पाई. इसी बीच, कितने मर्दों ने मेरे जिस्म पर हाथ मार लिए थे. कोई मेरी गांद को टच कर गया, कोई मेरे बूब्स को मसल गया, तो कोई मेरी कमर पर हाथ लगा गया. हर तरफ से मुझे च्छुआ जेया रहा था, और इस सब में, मेरी साँसें तेज़ हो रही थी. मैं बस किसी तरह अंदर पहुँचना चाहती थी.

बस के अंदर घुसने के बाद, मुझे बैठने को बिल्कुल जगह नही मिली. बस पूरी तरह से भारी हुई थी. मैं कुछ मर्दों और कॉलेज के लड़कों के बिल्कुल बीच में फँस गयी. चारो तरफ से लोग थे, और हर तरफ से मुझे च्छुआ जेया रहा था. हर धक्के के साथ, मैं किसी ना किसी अजनबी बदन से टकरा रही थी. मैं कोशिश कर रही थी खुद को संभालने की, पर भीड़ इतनी थी की मेरी हर कोशिश बेकार हो रही थी.

अब उस तंग जगह में, हर तरफ से दबाव पड़ने लगा. लोगों के शरीर से आती गर्मी और उनका स्पर्श मुझे एक अजीब सी हलचल दे रहा था. मैं अरुण के साथ की रात से पहले ही गरम थी, और अब इन गैर मर्दों के स्पर्श से मेरा जिस्म और भी सुलगने लगा. मेरे अंदर एक नयी आग सी उठने लगी थी.

मेरे ठीक पीछे, एक आदमी खड़ा था. हर झटके के साथ, उसका सख़्त लंड मेरी गांद से टकरा रहा था. पहले तो वो हल्का था, पर फिर धीरे-धीरे वो लगातार मेरी गांद पर रगड़ने लगा. उसका लंड मेरी सारी के उपर से मेरी गांद को गरम कर रहा था, और मुझे उसकी हरकत सॉफ महसूस हो रही थी. उसकी ये हरकत मुझे भीतरी तौर पर हिला रही थी.

मैं अब गरम हो रही थी, और उसने ये महसूस कर लिया था. उसका लंड और ज़्यादा दबाव बनाने लगा. मैने उसको गुस्से से आँखें दिखाई, जैसे कह रही हू ‘रुक जाओ’. पर भीड़ इतनी थी की हमारी आँखें मिल भी नही पा रही थी. हर धक्के के साथ, उसकी गर्मी मेरी गांद में उतरती जेया रही थी, और मैं अंदर ही अंदर तड़पने लगी थी.

एक पल के लिए तो मुझे लगा, जैसे मैं चलती बस में ही चूड़ने का मॅन बना चुकी थी. मेरी छूट और गांद दोनो ही उसके लंड की रग़ाद से तड़प रही थी. उसका लंड मेरी गांद पर ऐसा फील हो रहा था की अभी उसको अपनी गांद में उतार लू. पर मैं इतनी भी च्चिनाल नही थी की राह चलते किसी के साथ चुड जौ. मेरे अंदर की इज़्ज़त और शरम मुझे रोक रही थी, पर जिस्म की प्यास मुझे बेचैन कर रही थी.

जैसे ही कॉलेज का स्टॉप आया, बस थोड़ी खाली हुई. मेरे आस-पास खड़े सारे कॉलेज के लड़के उतार गये, जो अभी तक मुझे घूर रहे थे और धक्के मार रहे थे. जाते-जाते भी वो मुझे मूड-मूड कर घूर रहे थे, और मैं उनकी नज़रों से शर्मा रही थी.

वो आदमी भी उतार गया जो मेरे ठीक पीछे खड़ा था और मेरा बदन गरम कर रहा था. जैसे ही वो बस से नीचे उतरा, मेरी नज़रें उसकी पंत के उभार पर पड़ी. उसका लंड अब भी तंन कर सॉफ दिख रहा था, जैसे अभी-अभी किसी औरत को छोड़ कर आया हो. मैने झट से अपनी नज़रें हटा ली और शर्मा गयी. वो भी समझ गया की मैने भी इस सब में एंजाय किया है. वो कॉलेज के बस स्टॅंड पर खड़ा रहा और मुझे देखता रहा, जब तक बस आयेज नही बढ़ी.

मैं भी उसको सेडक्टिव नज़रों से देख रही थी, एक आखरी बार. फिर बस निकल गयी और मैं अपने घर की तरफ चल पड़ी.

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