अंतर्वसना कहानी अब आयेज से-
एक दिन सब को एक रिश्तेदार के घर फंक्षन में जाना था. मैं तैयार होने के लिए तोड़ा ज़्यादा टाइम लिया, क्यूंकी मॅन था कुछ अलग पहनने का – शर्मीली भी, और थोड़ी सयानी भी. मैने एक डीप वाइन कलर की ऑर्गन्ज़ा सारी निकली – ट्रॅन्स्ल्यूसेंट, सॉफ्ट और बॉडी के हर कर्व पर हल्की सी लिपटी हुई. सारी में छ्होटी-छ्होटी ज़ारी की कढ़ाई थी, जो लाइट में शिममरी लग रही थी – ना ज़्यादा चमक, ना डल… बस इतनी की आँखें अटक जाए.
ब्लाउस सिल्क का था, बोट नेक और एल्बो लेंग्थ स्लीव्स, पर बॅक में व-कट डिज़ाइन, जिसमे मेरी स्मूद बॅक का कर्व ज़्यादा सेनुयल लग रहा था. ब्लाउस तोड़ा टाइट था, जिसमे से मेरी ब्रेस्ट्स की रौंद शेप ब्लाउस के कपड़े को तोड़ा उभार रही थी, बिना ज़्यादा रिवील किए. जैसे च्छूपा के भी सब कुछ दिख रहा हो.
सारी मैने फ्रंट पल्लू स्टाइल में ड्रेप की थी, प्लीट्स टाइट और पल्लू लूस, जो एक साइड से मेरी बूब्स के कर्व पर हल्की सी बचानी के साथ गिर रहा था. मेरी कमर पर्फेक्ट्ली एक्सपोज़ हो रही थी, और नीचे से सारी का कपड़ा मेरी रौंद और फर्म गांद से चिपक के हर कदम में हिल रहा था, बिना कोई बदतमीज़ी के, बस एक स्लो पाय्सन जैसे.
ये लुक मेरे दिल के काफ़ी करीब है. क्यूंकी जब मैं रेडी हो कर हॉल में आई, तो मेरे जेठ जी बस मुझे कुछ पल के लिए ताकते ही रह गये. उनकी आँखों में एक अजीब सी चुप्पी थी, ना जाने कैसी भूख, जो आँखों से झलक रही थी. पहली बार उस दिन मुझे महसूस हुआ की वो मुझे सिर्फ़ भाभी की नज़र से नही, एक औरत की तरह देख रहे है. एक ऐसी औरत, जिसे वो कभी छ्छू नही सकते, पर देख कर भी सब कुछ महसूस कर सकते थे.
पुर फंक्षन के दौरान हम एक-दूसरे को चोरी-चोरी देखते रहे. जैसे आँखों का खेल चल रहा हो. उनकी नज़र कभी मेरी कमर पर टिक जाती, तो कभी ब्लाउस के व-कट पे. मैं भी च्छूप-च्छूप कर उनकी तरफ देखती थी. लेकिन हर बार मेरी जेठानी का ख़याल आ जाता, जो मेरी हर मूव्मेंट पे नज़र रखे थी.
उन्हे शक ना हो इसलिए मैने बैठने की जगह बदल ली, पर मेरी आँखों का क्या? वो तो हर पल अपने जेठ जी को ही ढूँढती रही. लगता था उनकी भी यही हालत थी, क्यूंकी हर बार जब मैं उनकी तरफ देखती, वो मुझे ही देखते मिलते. आँखों में वही अधूरा सा जुनून, वो अधूरा सा हक़, जैसे हम दोनो किसी खींचाव में बँधे हो, जिसे हम च्छुपाना भी चाहे और महसूस भी करते रहे.
उस फंक्षन के बाद सब कुछ अंदर ही अंदर बदल गया था. मेरे और जेठ जी के बीच अब सिर्फ़ आँखों का रिश्ता नही रहा था. अब मैं चाहती थी की उनकी आँखों से कुछ और भी निकले, कुछ बेपनाह हवस, जिसे मैं महसूस कर साकु.
एक बार सुबह का वक़्त था. मैं बातरूम में नहा रही थी, और उस दिन ग़लती से मैने डोर का लॉक ठीक से नही लगाया था.
नहा कर निकलते वक़्त मैने बस एक टवल अपने आस-पास लपेटा था. हाथ में अपनी ब्रा थी की अचानक से बातरूम का डोर खुल गया.
दरवाज़ा जेठ जी ने खोला था.
हम दोनो एक पल के लिए जैसे फ्रीज़ हो गये. मेरी आँखें उनसे मिली, उनकी आँखें तुरंत नीचे झुक गयी. वो हक्के-बक्के हो कर बस “सॉरी!” कह कर डोर बंद कर गये. लेकिन उस एक लम्हे में सब कुछ कह दिया गया था.
मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, और मेरी साँसें कुछ देर तक रुकी सी थी. मैं एक सेकेंड के लिए हिल नही पाई. पता नही शरम ज़्यादा थी या कुछ और… लेकिन मेरे गाल लाल हो चुके थे.
थोड़ी देर बाद जब मैं नॉर्मल कपड़े पहन के बाहर आई, वो हॉल में सोफे पर बैठे थे. उनकी आँखों में एक अजीब सी शरम और बेचैनी थी. मैं उनके पास से गुज़री, तो उनका चेहरा देख के मुझे हँसी आ गयी. वो जैसे स्कूल के बच्चे की तरह ब्लश कर रहे थे.
मैं हंस पड़ी और उन्होने भी आँखों से मेरी तरफ देखा. फिर हम दोनो के बीच एक च्छूपी हुई मुस्कुराहट ने सब कुछ कह दिया. उस दिन एक नया एहसास, एक अंजना रिश्ता शुरू हुआ था.
एक बार जेठ जी और जेठानी उनके एक रिश्तेदार की शादी में जाने वेल थे. जेठानी तैयार हो रही थी. उन्हे सारी पहनने में हेल्प चाहिए थी. उन्होने मुझे बुलाया था, क्यूंकी ब्लाउस पहनने के बाद पल्लू सेट करने में हमेशा मैं ही उनकी मदद करती थी.
मैं उनके रूम में गयी, तब वो बातरूम में थी, ब्लाउस और पेटिकोट पहने हुए. “सपना, एक मिनिट रुक ना… पल्लू सेट करवाना है,” उन्होने अंदर से आवाज़ दी.
मैं हा कह कर बेड के पास खड़ी हो गयी. तभी मेरी नज़र जेठ जी पर पड़ी. रूम में सिर्फ़ मैं और जेठ जी थे. वो अपनी आल्मिराह के पास खड़े हो कर शर्ट्स निकाल रहे थे, और एक-एक करके देखते जेया रहे थे की शादी के लिए क्या पहना जाए.
उन्होने मुझे देखा, बस एक पल के लिए. लेकिन उस पल में ही आँखों से एक हल्का सा सवाल च्छूप कर निकल आया. वो एक-एक शर्ट को छ्छू कर मेरी तरफ देख रहे थे.
मैं तोड़ा सा रुकी, फिर बिना कुछ कहे एक शर्ट की तरफ इशारा किया. उन्होने मेरी तरफ नज़र टिकाए-टिकाए वही शर्ट उठाई. फिर बटन लगते-लगते फिर से एक बार देखा.
पता नही क्यूँ, लेकिन उस मोमेंट में मुझे एक बीवी जैसा महसूस हुआ, जैसे मैं उसकी हू. मेरे अंदर कुछ हल्के से गीला सा हुआ, एक अंजानी सी कसक, एक अजनबी सी खुशी. वो कुछ नही बोले पर जैसे उनकी मुस्कान ने सब कुछ कह दिया.
अगले ही पल बातरूम का डोर खुला और जेठानी बाहर आई. उनकी आवाज़ ने मुझे हक़ीक़त में वापस ला दिया. मैं तुरंत मुस्कुराते हुए उनकी तरफ गयी, जैसे कुछ हुआ ही ना हो.
“आओ, इसे आचे से पिन कर देती हू,” मैने कहा, और पल्लू उठा कर उनके कंधे पे सेट करने लगी.
जेठानी मिरर में खुद को देखती जेया रही थी. मैं उनका लुक सेट कर रही थी, पर मेरा मॅन अभी तक पिछले कुछ पलों में अटका हुआ था. मैं बिल्कुल नॉर्मल थी, बिल्कुल एक संस्कारी बहू जैसे. लेकिन दिल के कोने में अब भी उन आँखों की मुस्कान बस्सी हुई थी. वो हल्का सा पल जैसे दिल की छ्होटी सी डाइयरी में च्छूप हो गया हो.
एक दिन जेठ जी के मोबाइल में मेरी ननंद का कॉल आया. मैं ड्रॉयिंग रूम में थी. मुझे भी एक काम था, तो मैने जेठानी से कॅष्यूयली कहा, “आपकी बात हो जाए तो मुझे फोन दे देना.” उन्होने फोन मुझे पकड़ा दिया. मैं फोन लेकर अपने बेडरूम में चली गयी और भूल गयी की ये मेरा नही, जेठ जी का फोन था.
रूम लॉक करके मैं बेड पर लेट गयी. कॉल ख़तम हुआ तो मैने हाथ में फोन घूमते-घूमते वेब ब्राउज़र खोला. तब मुझे याद आया की ये तो जेठ जी का फोन था. जैसे ही ब्राउज़र ओपन हुआ, एक अजीब सी गर्मी मेरे अंदर उठने लगी.
कुछ टॅब्स ऑलरेडी खुले हुए थे. क्यूरीयासिटी में मैने एक ताप किया, भाभी की चुदाई, छ्होटी भाभी को जेठ ने छोड़ा, इंडियन मॅरीड वुमन सेक्स स्टोरीस और कुछ देसी पॉर्न क्लिप्स भी ऑलरेडी बफर हो चुकी थी. मेरे हाथ काँप गये, लेकिन आँखें स्क्रीन से हॅट नही रही थी.
एक वीडियो प्ले हुआ, जिसमे एक औरत अपने ब्लाउस उतारते हुए मर्द के सामने खड़ी थी. उसका फिगर बिल्कुल मेरे जैसा था. उसके मेरे जैसे बड़े बूब्स और कमर पे टाइट लेगैंग्स थी. मुझे लगा जैसे जेठ जी मुझे ही इमॅजिन करके ये सब देखते हो.
मेरे अंदर एक अजीब सी आग भड़क उठी. मुझे उस मोमेंट पे कोई शरम नही महसूस हुई. बस एक कसक जाग उठी थी जो कब से दबा के रखी थी. मैने लेगैंग्स के अंदर हाथ डाल दिया. मेरी चूत ऑलरेडी गीली हो चुकी थी. हर मसल, हर उंगली की हलचल से मेरी साँसें तेज़ होने लगी. मेरी कमर उठने लगी. मेरी अंगड़ाई एक-दूं से और सेनुयल हो गयी थी.
तभी ‘नॉक नॉक नॉक’ किसी ने दरवाज़ा खटखटाया. मैं झट से उठी और हाथ संभालते हुए सारे टॅब्स क्लोज़ किए. हिस्टरी क्लियर की, पूरा फोन सॉफ कर दिया. बस ये भूल गयी की ब्राउज़र अभी भी बॅकग्राउंड में ओपन था. कपड़ों को ठीक करके, नॉर्मल सा लुक बना के दरवाज़ा खोला. और सामने जेठ जी खड़े थे.