मेरा नाम सपना है, और मैं 38 साल की एक शादी-शुदा और भरपूर जिस्म की मालकिन हू. मेरे रूप में एक अजीब सा खींचाव है, जिसे मैं खुद भी महसूस करती हू. मेरा फिगर 36सी-32-38 है, और मेरे बूब्स का हेवी और पर्फेक्ट्ली शेप्ड होना हर कपड़े में उभर कर नज़र आता है. मेरी कमर पतली और गांद बिल्कुल टाइट है, जो सारी या लेगैंग्स में और भी ज़्यादा अट्रॅक्टिव लगती है.
मैं अपने लुक्स का ध्यान रखती हू, पर एक डीसेन्सी और ग्रेस के साथ. घर में सलवार-कुरती या कंफर्टबल लेगैंग्स पहेनटी हू, अक्सर बिना ब्रा के. बाहर जाते वक़्त जीन्स-टॉप या कभी-कभी एक एलिगेंट सारी को चुनना पसंद करती हू, जिसमें मेरी कमर और हिप्स की शेप क्लियर दिखे.
मैं यहाँ अपने सास-ससुर, जेठ-जेठानी और उनके दो बच्चों के साथ रहती हू. मेरा 14 साल का बेटा बोरडिंग स्कूल में पढ़ता है, और उसकी कमी हर दिन महसूस होती है. पूरा दिन घर के काम, रसोई और ज़िम्मेदारियों में गुज़र जाता है. पर जब रात होती है, तो अकेलापन चुभने लगता है.
मेरे पति मर्चेंट नेवी में है और साल में सिर्फ़ दो बार, कुछ दीनो के लिए घर आते है. वो 10-15 दिन मेरे लिए एक सपने जैसे होते है. हर रात वो मेरी हर प्यास बुझाते है. मैं उनका प्यार अपने हर अंग से महसूस करती हू. जब वो मेरे हेवी बूब्स को चाट-ते है, मेरी भीगति छूट पर अपना जादू चलती है, और फिर अपने लंड से मुझे उसी तरह छोड़ते है जैसे मैं चाहती हू.
अक्सर मैं घर पर बोर हो रही थी, और हज़्बेंड की गैर-मौजूदगी में सेक्षुयल नीड्स बहुत ज़्यादा महसूस हो रही थी. दोपहर का समय था, काम निपटा कर मैं अपने बेडरूम में आई थोड़ी देर आराम करने. मॅन बोर हो रहा था तो मैने फोन उठाया और नेट पर कुछ रॅंडम सर्च करने लगी. कभी शॉपिंग साइट्स, कभी Yऔटुबे… पर एक बार ग़लती से एक अजीब सा लिंक क्लिक हो गया. जैसे ही पेज खुला, मैं तोड़ा चौक गयी — एक सेक्स स्टोरी साइट थी. तब से मैने नेट पर ऐसी स्टोरीस पढ़ना शुरू कर दिया.
एक दिन मुझे एक ऐसी स्टोरी मिली जिसमें एक लेडी को उसके जेठ ने छोड़ा था. वो स्टोरी पढ़ कर मुझे एक अजीब सी झुरजुरी सी हुई. मैने पहली बार वहाँ खुद को महसूस किया और मेरे दिमाग़ में मेरे जेठ नवीन जी का ख़याल आया. मेरी साँसें तेज़ हो गयी थी. स्टोरी में जब उसका जेठ उसके ब्लाउस के हुक्स खोलता है, मैं अपना कुरती का गला नीचे खींच कर अपने बूब्स को हाथ से दबाने लगी. मेरे निपल्स ऑलरेडी सख़्त हो चुके थे.
एक हाथ से फोन पकड़े थी, और दूसरे हाथ से लेगैंग्स के अंदर जेया चुकी थी. मेरी छूट इतनी गीली थी जैसे किसी ने ऑलरेडी चाट दिया हो. मैं धीरे-धीरे अपनी उंगली से छूट मसल रही थी, और आँखें बंद करके बस जेठ जी के हाथो को महसूस करने की कोशिश कर रही थी. 5 मिनिट भी नही लगे, और मैं ज़ोर से झाड़ गयी. सारा बदन काँप गया. बेड शीट भी हल्की सी भीग गयी थी.
उस दिन शाम को जब जेठ जी ऑफीस से आए, तो जैसे कुछ पल के लिए मेरी साँस ही रुक गयी. पहले तो मैने उन्हे हमेशा एक मर्यादा में देखा था, अपने पति के बड़े भाई के रूप में. हमेशा रेस्पेक्ट की नज़र से, कभी एक पल के लिए भी कोई और सोच नही आई थी. पर आज… आज मैं उन्हे देख कर वही कहानी याद कर बैठी थी जो दोपहर में ग़लती से पढ़ ली थी. वो कहानी जो शायद कभी पढ़ना ही नही चाहिए था. मेरे अंदर कुछ बदल गया था… कुछ जाग गया था.
उनका आना, वो रोज़ की तरह था — हल्की सी थकान, कुछ फाइल्स हाथ में, और उनकी यूषुयल कॅषुयल सी शर्ट जिसमे कुछ बटन्स खुले थे. पर मुझे आज वो थकान भी सेक्सी लगी… वो पसीना भी एक अजीब सी खुश्बू दे रहा था, जो सीधा मेरे अंदर तक घुस रही थी. मुझे आज उनके कदम भी मर्द लग रहे थे… वो आँखें, वो बॉडी, सब कुछ अलग लग रहा था.
मुझे खुद पे यकीन नही हो रहा था. ये मैं क्या सोच रही हू. मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, जैसे उसका हर बीट कह रहा हो ग़लत है. पर ना चाह कर भी मुझे ठीक भी लग रहा था.
एक अजीब सी घबराहट थी, पर उस घबराहट के पीछे एक च्छूपी हुई एग्ज़ाइट्मेंट भी थी. जिस जेठ जी को मैने हमेशा बड़े भाई का दर्जा दिया था, आज उनकी एक मुस्कान, उनकी एक नज़र मुझे कुछ और महसूस करा रही थी. शायद क्यूंकी मैने दोपहर में वो कहानी सिर्फ़ पढ़ी नही थी, जी ली थी. और जो कुछ मेरे जिस्म के साथ हुआ था, उससे मैं इग्नोर नही कर पा रही थी.
जब उनकी और मेरी आँखें टकराई, तो जैसे टाइम रुख़ गया हो. एक सेकेंड… सिर्फ़ एक सेकेंड… पर उस एक पल में जैसे मेरी सारी सोच, मेरी सारी मर्यादा, मेरी शराफ़त- सब कुछ बेचैन हो उठी थी. उन्होने भी मुझे देखा, और शायद कुछ अलग महसूस किया. एक नज़र में कुछ तो था. जैसे मैं उनकी आँखों में पहली बार अपने लिए कुछ और ही देख रही थी — ना वो बहू वाली रेस्पेक्ट थी, ना फॉरमॅलिटी. कुछ और था… कुछ मर्द और औरत के बीच का. उस पल के बाद दोनो ने ही नज़र हटा ली. एक अजीब सी हिचकिचाहट थी.
उस दिन के बाद मुझे चैन ही नही था. हर दोपहर, जब घर के सारे काम निपटा लेती थी, तो मैं अपने बेडरूम में चली जाती. दरवाज़ा बंद करके बेड पे लेट जाती और फोन में वही स्टोरीस ढूँढती — भाभी और जेठ की चुदाई वाली कहानियाँ.
जाने क्यूँ, जब भी किसी औरत का अपने जेठ के साथ फिज़िकल रीलेशन होता था ना, तो मेरे अंदर एक अजीब सी गर्मी उठती थी. जिस्म में जलन सी महसूस होती थी, और छूट में हल्का सा गीला-पं, जैसे मेरी छूट भी किसी के लंड का इंतेज़ार कर रही हो.
स्टोरी पढ़ते हुए, मैं अपने पैर चादर के अंदर ले जाती थी, उन्हे तोड़ा कस के बंद करती जैसे कोई मुझे ज़ोर से पकड़ रहा हो. कभी-कभी मेरी उंगलियाँ अपने आप ही पनटी के उपर से छूट के पास पहुँच जाती थी. बस तोड़ा सा प्रेशर डालती और पूरा जिस्म काँप उठता था.
एक रात तो सब हड्द पार हो गयी. मैने सपने में देखा की मैं अपने जेठ जी के साथ बेड पे हू. मेरी निघट्य घुटनो तक चढ़ि है और उनका लंड मेरी छूट के अंदर धीरे-धीरे घुस रहा है. इतना ठोस, इतना भरपूर था वो सपना की मैं नींद में ही झाड़ गयी.
जब आँख खुली, तो मेरी पनटी पूरी तरह से गीली थी, जैसे किसी ने सच में मेरी छूट को चाट दिया हो या फिर अंदर तक भर दिया हो. मैं तोड़ा हँसी, तोड़ा घबराई, लेकिन सबसे ज़्यादा मुझे महसूस हुई अपने अंदर एक औरत की असली भूख, जो सिर्फ़ एक मर्द के लंड से ही शांत होती है.
मैने पनटी बदली, लेकिन नींद वापस नही आई. बेड पे लेती थी, पर आँखों के सामने सिर्फ़ जेठ जी का चेहरा था. उनकी वो गहरी आँखें, वो तोड़ा डार्क स्किन जिसमे एक अलग ही रगेड चर्म था… और सबसे ज़्यादा उनका वो पल, जब हमारी नज़र टकराई थी. उस रात मुझे समझ आया… की मेरे अंदर कुछ बदल चुका है.
दूसरे दिन जब मैं बेडरूम से बाहर निकली, तो मेरी नज़र सीधा उन पर पड़ी. पता नही क्यूँ, लेकिन उनको देखते ही मेरे दिल में एक मीठा सा एहसास जाग गया. जैसे आँखों ने जो देखा हो, वो सिर्फ़ आँखों तक नही रुका… उसने दिल को छ्छू लिया हो. मैने उनको हल्का सा स्माइल दिया, और उन्होने भी मुझे वैसा ही जवाब दिया. लेकिन उनकी आँखों में एक अलग सी चमक थी, एक अंजानी सी गर्मी.
उस दिन के बाद, जब भी वो घर में होते, मैं उन्हे च्छूप-च्छूप के देखा करती थी. हर बार उनका बदन, उनकी चल, उनका अंदाज़, सब कुछ मुझे अपनी तरफ खींचता था. जैसे हर पल, हर नज़र मेरी छूट में एक नर्मी, एक हल्का सा गीला-पं भर देती थी.
उनकी हर हरकत, चाहे वो ऑफीस जाने के टाइम फॉर्मल पहेनटे या शाम को घर आने के बाद शॉर्ट्स और त-शर्ट — मैं सब कुछ नोटीस करती थी. जब मैं कपड़े सूखने के वक़्त उनका अंडरवेर हाथ में लेती थी, तो उसमे लंड का अंदाज़ा लगा कर ही मेरी साँस तेज़ हो जाती थी. मुझे लगता था, उनका लंड कैसे दिखता होगा, कैसा महसूस होता होगा… ये सोच के ही मेरी छूट भीग जाती थी.
मुझे लगता था, वो भी ये सब महसूस कर रहे थे. कभी-कभी उनका मुझे लंबे वक़्त तक देखते रहना, मेरी बातों में एक्सट्रा इंटेरेस्ट लेना… कुछ तो था. लेकिन हम दोनो ने कभी भी कोई लिमिट क्रॉस नही की. सब कुछ सिर्फ़ आँखों तक था. नज़रों की एक ऐसी भाषा, जिसमे सब कुछ था, डिज़ाइर, समझ, और तोड़ा सा दर्र भी.
मैं बहुत कन्फ्यूज़्ड थी. क्या ये सिर्फ़ मेरी तरफ से था? क्या मैं ही ओवर्तिंक कर रही थी? या फिर उनके दिल में भी कुछ ऐसा था जो उन्होने च्छूपा रखा था? हर रोज़, ये सवाल मुझे और बेचैन करता जेया रहा था.
आयेज की कहानी, अगले पार्ट में.