मम्मी की कामुकता की वापसी

सेक्स स्टोरी अब आयेज-

उस दिन के बाद मैं मम्मी से काम के अलावा कोई बात नही करता था. मैं उनकी नज़रों से हमेशा डोर रहता था. मेरी आँखों में वो चुम्मा-छाती का मंज़र घूमता रहता था, और मम्मी का वो गुस्से भरा थप्पड़. वो भी मुझसे दूरी बना कर ही रहती थी. शायद उन्हे भी हर पल वो राज़ और मेरी उस पर नज़र याद आती होगी.

हम दोनो के बीच एक अजीब सी खामोशी च्छा गयी थी, जैसे एक अनकही दीवार खड़ी हो गयी हो.

ऐसे ही एक दिन मेरे घर पर किसी ने कहा, “आज कल अनिरुढ़ भाई कहा है? उनकी कोई खबर ही नही है?”

मैने कहा, “मुझे पता नही है. बहुत टाइम से मैं भी उनसे नही मिला.”

मम्मी ये सब सुन रही थी. मैने उनके तरफ देखा तो उन्होने मेरे से नज़रें मिलने की कोशिश की, पर मैने ही नज़र घुमा दी. मुझे उनका वो उदासी भरा चेहरा देखना अछा नही लग रहा था. पर अब क्या करता? उनके अंदर की आग को जगाने की कोशिश की थी, पर वो तो उल्टा बुझ गयी थी.

एक दिन ऑफीस से घर गया तो मैं मम्मी को देख कर चौक गया. मम्मी ने एक ऐसी सारी पहनी थी जो उनके हर कर्व को गले लगा रही थी.

वो डार्क ग्रीन कलर की सारी अब उनके जिस्म पर पूरी तरह से चिपक चुकी थी, और उसके साथ उनका डीप कट ब्लाउस उनके भरे हुए बूब्स को और भी उभारता था. काई दीनो बाद मम्मी ने खुद को इतने खुल कर दिखाया था. उनका पल्लू तोड़ा नीचे सरक गया था, जिससे मुझे उनकी क्लीवेज दिखाई दी.

सारी इतनी टाइट बँधी थी की गांद का उभार सॉफ दिख रहा था. उनमे एक अजीब सी नज़ाकत थी, जो उनके अंदर की च्छूपी हुई आग को बयान कर रही थी.

मम्मी ने जब मुझे उनको घूरते हुए देख लिया, तो उन्होने मुझे नॉटी स्माइल दी. उनकी आँखों में वही पुरानी शरारत और वासना थी, जो मैने अनिरुढ़ भाई की वजह से देखी थी. मैं तो समझ ही नही पा रहा था की ये हक़ीकत थी या सपना. मेरी साँसें तेज़ हो गयी थी, और मेरे अंदर भी वही पूरनी मम्मी को अनिरुढ़ भाई से छुड़वाने की चाहत फिर से उभर रही थी.

फिर मम्मी ने मुझे इशारे से उनके कमरे में बुलाया. उन्होने डोर को अंदर से बंद किया और मेरा हाथ पकड़ कर उनके पास बेड पर बिता दिया. उनके हाथो का स्पर्श गरम और नरम था, जिससे मेरी बॉडी में एक तेज़ करेंट दौड़ गया. मैं अपने खड़े होते लंड को कंट्रोल कर रहा था.

मम्मी (आँखों में नामी के साथ): आराव, प्लीज़ बेटा मुझे माफ़ करना. मैने तुझे बहुत ग़लत समझा. सॉरी बेटा.

मैं: इट’स ओके मम्मी. आपको खुश देख कर मैं खुश हू.

मम्मी (मेरी आँखों में देखते हुए): सच में बेटा, तुमने मुझे माफ़ कर दिया ना?

मैं: हा मम्मी. मैं कभी आप से नाराज़ ही नही था.

मम्मी: लेकिन बेटा मेरी वजह से तुमने अनिरुढ़ जी से दोस्ती तो खराब नही की ना?

मैं: आपकी खुशी के लिए मैं ऐसे काई दोस्तों को छ्चोढ़ सकता हू.

मम्मी: नही बेटा, अनिरुढ़ जी बहुत आचे है. उनके जैसा दोस्त तुझे मिला है वो अची बात है. उनसे दोस्ती नही तोड़ना.

मैं: ठीक है, जैसा आप कहे. (उनके चेहरे को गौर से देखते हुए): लेकिन अभी भी आपके चेहरे पर वो चमक नही दिख रही जो पहले दिखती थी. वो खुशी अभी भी गायब है.

मम्मी शर्मा गयी, उनके गाल हल्के गुलाबी हो गये.

फिर मैने कहा: लगता है अनिरुढ़ भाई को घर पर खाने के लिए बुलाना पड़ेगा.

मम्मी का चेहरा शरम से लाल हो गया, उन्होने अपनी नज़रें झुका ली. उनकी साँसें तेज़ हो गयी थी, और उनके उभरे हुए सीने में एक हल्की सी हलचल दिख रही थी.

मैं (मुस्कुराते हुए): हा, अब आई असली चमक.

मम्मी इतना शर्मा गयी की उसने अपना मूह मेरे सीने में च्छूपा लिया. मैने भी सिचुयेशन का फ़ायदा उठा कर उनकी पीठ को सहला दिया. मैं अपना हाथ उनकी पीठ से उनकी कमर पर लेकर गया. मम्मी हल्का गरम हो गयी. मैने उनकी गांद पर हाथ रखा हुआ था और तोड़ा दबाव बनाए रखा था. मैं पहली बार मम्मी का गरम जिस्म फील कर रहा था.

मैं: मम्मी, आपको अनिरुढ़ भाई पसंद है ना?

मम्मी कुछ बोल नही रही थी बस मेरे हाथ पर दबाव बनाने लगी.

मैं: कितना शर्मा रही हो. अब हम दोस्त जैसे है.

मम्मी ने अपना सर उठाया और मेरी आँखों में देख कर बोली: आराव तुम बहुत आचे हो. मुझे लगा तुम मुझे कैसी समझोगे.

मैं (उनके होंठो पर उंगली रख कर): मैं जानता हू आप घर की इज़्ज़त के बारे में सोच रही हो. मेरे पर भरोसा रखो. किसी को कुछ नही पता चलेगा. मैं सब संभाल लूँगा.

मैने मम्मी के माथे पर किस किया. मम्मी ने मेरी आँखों में देखा और मेरे होंठ पर एक हल्का किस किया. मेरी तो रूह काँप गयी. फिर उसके बाद मम्मी ने मेरे गाल पर 2-3 किस किए और मेरे से लिपट गयी. मम्मी फिर मेरी गोदी में सर रख कर सोने वाली थी, मैने अपना खड़ा लंड च्छुपाने के लिए बीच में तकिया रख दिया.

मम्मी: अनिरुढ़ जी आज आएँगे ना?

मैं (उनके हाथो में मेरा मोबाइल देकर): अब आप ही उनको बुला लो. आपकी बात वो माना नही कर पाएँगे.

मम्मी का चेहरा खिल कर लाल हो गया. मैने मम्मी का सर अपनी गोदी से साइड किया और उनके गाल पर किस किया. मम्मी की आँखों में अब मुझे अपनी छूट की गर्मी शांत करवानी की तलाप दिख रही थी.

मैने उनके हाथो से मोबाइल लेकर अनिरुढ़ भाई को कॉल किया और मम्मी के कान में फुसफुसाया: आप दोनो अकेले बात करो, मैं बाहर देखता हू कोई अंदर ना आए.

मम्मी की आँखों में चमक आ गयी. उन्होने अपनी आइब्रो उपर करके अपनी खुशी का ज़िकार किया. मैं मम्मी के कमरे के बाहर खड़ा हो कर घर के दूसरे लोगों पर नज़र रख रहा था.

थोड़े टाइम बाद मम्मी कमरे से बाहर आई और मुझे मेरा मोबाइल दिया. मैने मेरी आइब्रो उपर करके इशारे से पूछा की वो आ रहे थे क्या?

उन्होने मुझे आँख मार कर नॉटी स्माइल दे कर किचन की तरफ चल पड़ी. मैं समझ गया की अनिरुढ़ भाई आ रहे थे. ऐसा सेक्सी माल बुलाए और कोई मर्द ना आए, ऐसा हो सकता है क्या?

मैं सॉफ देख पा रहा था की मम्मी की उभरी हुई गांद सारी में मस्त हिल रही थी. शायद उनको पता था या मेरी पंत के उपर का उभार देख लिया था, वो पीछे मूड कर मुझे नॉटी स्माइल दिया और किचन में चली गयी.

मैने फिर अनिरुढ़ भाई को कॉल किया. दो रिंग के बाद ही उन्होने उठा लिया.

मैं (धीमी आवाज़ में): अनिरुढ़ भाई, आ रहे हो ना?

अनिरुढ़ (एग्ज़ाइट्मेंट के साथ): हा आराव, यामिनी जी ने बुलाया है. मैं रात को खाना खाने आ रहा हू. पर वो मान कैसे गयी?

मैं: वो सब आपको मिलने पर बतौँगा. आप जल्दी आना अनिरुढ़ भाई. मम्मी इंतेज़ार कर रही है और मैं भी.

अनिरुढ़ भाई: इंतेज़ार तो मुझे भी है यामिनी जी से मिलने का.

मैं: ठीक है, रात को मिलते है.

मैने फोन काट दिया. अनिरुढ़ भाई की आवाज़ में वो पुरानी हवस और खुशी सुन कर मेरे अंदर भी एक अजीब सा जुनून दौड़ गया. अब रात का इंतेज़ार करना मुश्किल हो रहा था. घर में सब नॉर्मल लग रहा था, पर मेरे और मम्मी के बीच जो च्छूपी हुई आग जल रही थी, उसका एहसास सिर्फ़ हम दोनो को था.

रात को अनिरुढ़ भाई घर पर खाना खाने आए. दरवाज़ा पापा ने ही खोला. अनिरुढ़ भाई अंदर आए, सब से मिले, और उनकी नज़रें सबसे मिलते हुए आयेज बढ़ी.

थोड़ी देर बाद, मम्मी अनिरुढ़ भाई के लिए किचन से पानी लेकर आई. उन्होने अनिरुढ़ भाई को ग्लास थमने के लिए हल्का सा झुकाव लिया. उस पल मम्मी के डीप-कट ब्लाउस से उनकी गहरी क्लीवेज सॉफ दिखी. अनिरुढ़ भाई की नज़रें एक लम्हे के लिए वहीं ठहर गयी, उनकी आँखों में च्छूपी हुई हवस और भी तेज़ हो गयी.

मम्मी ने भी हल्की सी नज़र उठाई, उनके गाल हल्के गुलाबी हो गये, और एक शर्मीली मुस्कान उनके होंठो पर आ कर गायब हो गयी. उन्होने तुरंत अपनी नज़रें झुका ली.

जब मम्मी वापस किचन की तरफ मूडी, अनिरुढ़ भाई की नज़रें उनकी सारी में लिपटी गांद पर ठहर गयी, सिर्फ़ एक या दो पल के लिए. उनकी आँखों में वो भूखी हवस सॉफ थी, जो मम्मी के उभार को घूर रही थी. मम्मी ने शायद अनिरुढ़ भाई की नज़रें महसूस की, क्यूंकी उनकी गांद का हिलना और भी सेडक्टिव हो गया, जैसे वो जान-बूझ कर उन्हें टीज़ कर रही हो.

मैं ये सब चुप-छाप देख रहा था. मेरे अंदर भी एक अजीब सा जुनून उमड़ रहा था. मैं जानता था की मम्मी और अनिरुढ़ भाई दोनो को पता था की मैं इस नंगे खेल का हिस्सा था. मम्मी ने जब मेरी तरफ देखा, तो उन्होने हल्की सी मुस्कान दी. मैं अनिरुढ़ भाई को देखा, उन्होने भी मेरी तरफ देख कर एक हल्की मुस्कान दी, जैसे वो कह रहे हो, सब सेट है, आराव.

डिन्नर पर सब बातें कर रहे थे, हँसी-मज़ाक चल रहा था. पर मेरा और अनिरुढ़ भाई का ध्यान मम्मी पर ही था. मम्मी भी बार-बार अपनी नज़रें उठा कर हम दोनो को देखती और फिर शर्मा जाती. पर उस शरम में एक च्छूपी हुई खुशी थी.

उनका चेहरा अब पूरी तरह से खिल चुका था, और उनके अंदर की पुरानी चमक वापस आ गयी थी. हर बार जब वो हमारी तरफ देखती, उनके बूब्स का हल्का उभार और गांद की गोलाई और ज़्यादा दिखता, जैसे वो जान-बूझ कर हमे टीज़ कर रही हो.

उस दिन के बाद मम्मी फिर से अपने सजने सवारने में ध्यान देने लगी. उनकी सारी उनके जिस्म को इस तरह शो कर रही थी, जो देखने में तो संस्कारी लगता था. पर अगर कोई उनको हवस भारी नज़र से देखे, जैसे की मैं. उनके लिए तो वो आग लगाने वाला लुक होता था. मम्मी ने अपने सारे ब्लाउस टाइट करवा दिए थे, जिससे उनके बूब्स का उभार और भी सॉफ दिखता था.

मैं मम्मी को अब मम्मी नही, पर एक मिलफ की तरह देखने लगा था. शायद मम्मी को भी वो बात पता चल गयी थी. पर वो कुछ बोलती नही थी बस मुस्कुराती थी. कभी कभी मुझे लगता था वो जान-बूझ कर मुझे अपना क्लीवेज दिखती थी. शायद उनको ये सब अछा लगता होगा. या मेरी नज़र से वो अनिरुढ़ भाई को महसूस करती होगी.

मम्मी कभी-कभी मौका देख कर मेरे से कहती की अनिरुढ़ जी से बात करनी है. उनका और मेरा रिश्ता अब मा-बेटे का नही पर एक ख़ास दोस्त जैसा हो गया था, जिसमे उनका शरीर और मेरी हवस एक अनकही डोरी से बँधे थे.

अनिरुढ़ भाई भी अब मुझे डेली कॉल करते और मम्मी का हाल-चाल पूछते. उनकी आवाज़ में एक च्छूपी हुई बेचैनी होती थी, जैसे वो मम्मी को छोड़ने के लिए तड़प रहे हो. एक दिन मैं अनिरुढ़ भाई के फ्लॅट पर खाना खाने गया था. हम दोनो अकेले थे.

अनिरुढ़: यामिनी जी से मिलना है. कुछ कर ना.

मैं: मम्मी मिलना चाहती है क्या?

अनिरुढ़: ऐसा बोला नही है, पर मॅन तो उनका भी है ऐसा लग रहा हे.

मैं: तो घर पर आया करो ना खाना खाने.

अनिरुढ़: नही आराव, ऐसे बहुत बार आया करूँगा ना, तो घर पर किसी को शक होगा. और मैं वो नही चाहता. इसलिए कह रहा हू, बाहर मिलेंगे तो अछा है.

मैं: तो मम्मी को बाहर मिल लो.

अनिरुढ़: यामिनी जी दर्र रही है, किसी ने देख लिया तो?

मैं: बात तो सही है. आप बाहर के हो, आप यहाँ नही तो कहीं और. हम लोगों को यहाँ रहना है.

अनिरुढ़: इसलिए कह रहा हू ना, कुछ कर तू.

उस रात अनिरुढ़ भाई से बात करने के बाद मैं बहुत देर तक सोचता रहा. मम्मी और अनिरुढ़ भाई को मिलना है, ये तो तय था, पर कैसे? बाहर मिलना मुश्किल था, घर पर सब के सामने तो और भी मुश्किल.

मगर मैने एक रास्ता निकाल ही लिया. मैने अगले दिन अनिरुढ़ भाई को कॉल किया और अपना प्लान बताया. मैने उन्हे समझाया की जब अगली बार मम्मी से बात करे, तो वो कुछ ख़ास तरीके से अप्रोच करे. शायद मम्मी तब उनसे मिलने को राज़ी हो जाएँगी. अनिरुढ़ भाई मेरी बात सुन कर तोड़ा हैरान हुए. पर फिर उन्होने भी मेरी स्ट्रॅटजी मान ली.

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